Opinion · Reflection

अंतिम विदाई और आक्रोश

भारतवासी अन्याय और सामाजिक स्तरों के विभाजन शास्त्र में इतने दक्ष हो चुके हैं कि जब फिर से यह स्थापित अत्याचारी व्यवस्था मानवीय अधिकारों और संविधान द्वारा प्रदत्त संरक्षणों की धज्जियां उड़ाएगी, हम धैर्य के धनी स्वभाव-वश सह लेंगे। यह कुचक्र चलता रहेगा।

Opinion · Reflection

भारत के गांव

भारत की आत्मा उसके गांवों में रहती है। गांधी का यह कथन आज से 70 वर्ष पूर्व भले ही प्रासंगिक रहा हो, परन्तु  समय के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। आज यह कहना बेहतर होगा कि उस आत्मा के खंड हो गए हैं, और उसका एक हिस्सा बिछड़ कर शहरों की अदृश्य झुग्गियों अथवा माचिसनुमा घरों में तिल्लियों की भांति रहता है।

वर्त्तमान परिवेश में गांव की महत्ता और संभावनाओं पर कुछ विचार।

Reflection

लॉकडाउन और एक लाचारी

लॉकडाउन की अवधि और 19 दिनों के लिए बढ़ा दी गई है। सोचा था, चूंकि एकांत उपयुक्त समय होता है लेखनी का, तो खूब लिखा जाएगा। औरों का लिखा हुआ तो पढ़ा, परन्तु स्वयं कुछ लिखने की इच्छा धीरे-धीरे कम होती गई।

Reflection

Words of Wisdom from my Father

Amid tensions and talks around COVID-19 arriving into our daily discourses, recently at home I had some conversations at great length with my father. These were unique in a sense, and need special mention, not only because they went exceptionally late into night disrupting his sleep cycle the following day (never happened before), but also because of the clash of opinions and words of wisdom I received.

Opinion

The Failure of our Institutions

Delhi has burned. The smoke that rose blinds the eyes. More eyes are affected across the nation this time, not only because the looks directed towards the capital are yearning and hopeful, but also because the vision is often constricted to this area only.

Delhi is also the seat of the highest powers our country has to offer, namely the legislative, the executive and the judiciary. And yet such incidents happened at this very place. Does this by and large indicate the failure of our institutions, or is it yet another stage of normalisation, this time not only with toxic words but also with violent actions?